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सड़क पर चलते हुए आसमान तक

 13 जून 2026  आज का दिन भी निकल गया... सुबह उठे तो लगा कि आज दुनिया बदल देंगे, दोपहर तक लगा कि पहले चाय पी लेते हैं, और शाम तक समझ आ गया कि दुनिया कल भी बदली जा सकती है।  दिन अपने ही ढंग से बीता। कुछ काम हुए, कुछ टल गए, और कुछ बस दिमाग़ में ही घूमते रहे, जैसे उन्हें भी सही समय का इंतज़ार हो। बीच-बीच में कुछ लोगों की याद भी आई। कुछ ऐसे लोग, जिनसे बात करने का मन तो होता है, पर फिर सोचता हूँ — चलो, उन्हें भी थोड़ा चैन से जीने देते हैं।  वैसे ज़िंदगी भी कमाल की लेखक है, हर दिन नया पन्ना लिखती है, और अंत में पता चलता है कि कहानी अभी बहुत बाकी है। शाम को सड़क पर चलते-चलते एक बार आसमान की तरफ देखा तो लगा, सपने अभी भी वहीं हैं... थोड़े दूर, थोड़े महंगे, थोड़े पागल, लेकिन अपने हैं, इसलिए अच्छे लगते हैं। और हाँ, अगर कोई पूछे कि ज़िंदगी कैसी चल रही है, तो जवाब यही है— "दिल बड़े-बड़े सपने देख रहा है, दिमाग़ उनके हिसाब-किताब में लगा है, और बैंक बैलेंस दोनों को देखकर मुस्कुरा रहा है।"  आज की डायरी का आख़िरी वाक्य — "कुछ ख़्वाब अभी भी आसमान में टंगे हुए हैं, और मैं अभी भी ज़मी...