स्कूल और यादें


आज शाम जनरल स्टोर पर गये रतलामी सेव लेने, सेव भाजी खाने का मन था आज वहाँ हमे हमारी प्रिय आलू भुजिया रखी दिखी जिन्हें हम अपने स्कूल के समय में जब हम 11वीं और 12वीं में थे तब अधिकतर खाया करते थे. इसे देखकर खाने का मन हुआ और रतलामी सेव के साथ-साथ एक पैकेट इसका भी ले ही लिया.

जब 11वीं और 12वीं में थे तब जब भी क्लास से बाहर जाना होता था या ब्रेक होता था तब हम सबसे पहले सलीम अंकल के पास पहले जाते बाकि जगह बाद में और यूँ मान लीजिये की एक पैकेट और लोग 8 जैसे मंदिर में ठाकुर जी का प्रसाद मिलता है उसी तरीके से हम सब आलू भुजिया खाते किसी को मिल गई तो ठीक वरना एक दुसरे से छीन रहें हैं किसी को बाद में खाली पैकेट दे देते थे.

लंच के साथ जब तक आलू भुजिया न खाते तब तक हमारा लंच पूरा सा ही नही लगता था. एक व्यक्ति जाता और आलू भुजिया की एक दर्जन वाली पूरी लाइन गले में माला बनाकर ले आता था और फिर होती थी एक पैकेट पाने के लिए जंग-ए-आलू भुजिया.

आज ये देखकर स्कूल, कॉरिडोर, फिजिक्स लैब, क्लासरूम, काल्समेट्स, और आलू भुजिया सब याद आ गये और सबसे ज्यादा टीचर जो पढ़ाने के साथ साथ फील करवा देते थे. उनके समझाने के उदाहरण लाजबाब होते थे. मैं ये सब बहुत मिस करता हूँ.

बस इन्ही चीजों में स्कूल के दिनों को जी लेते हैं. यही छोटी छोटी यादें जो स्कूल के दिनों को ताज़ा कर देती हैं.

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