मन उलझा हो... तो मैं रेलवे स्टेशन चला जाता हूँ





कभी-कभी ज़िंदगी ऐसे मोड़ पर ले आती है जहाँ मन भारी हो जाता है। बहुत कुछ कहना होता है, पर कोई सुनने वाला नहीं होता। ऐसे वक़्त में मैं चुपचाप अपना बैग उठाता हूँ और चला जाता हूँ वहाँ... जहाँ मुझे कोई सवाल नहीं करता, कोई जवाब नहीं चाहिए – मैं रेलवे स्टेशन चला जाता हूँ।

हां, वही रेलवे स्टेशन। जहाँ दिन-रात ट्रेनें आती-जाती हैं। लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं। भीड़ होती है, पर फिर भी एक अजीब सी तन्हाई भी। मेरे लिए यह जगह किसी मंदिर से कम नहीं। वहाँ बैठकर मैं अपने सबसे सच्चे विचारों से मिलता हूँ।

मुझे वहाँ की आवाज़ें सुकून देती हैं – ट्रेन की सीटी, पटरियों की कंपन, प्लेटफॉर्म पर चाय वाले की पुकार। ये सब मिलकर ऐसा लगता है जैसे कोई पुराना दोस्त दिलासा दे रहा हो – “सब ठीक हो जाएगा।”

मैं अक्सर एक कोने में बैठकर लोगों को देखता हूँ। किसी के चेहरे पर विदाई का दुख होता है, किसी की आँखों में मिलने की खुशी। और फिर मैं सोचता हूँ – हम सब अपने-अपने सफ़र में हैं, कुछ भी स्थायी नहीं है।

रेलवे स्टेशन पर मुझे एहसास होता है कि जीवन भी एक यात्रा है। ट्रेन की तरह, कभी तेज़, कभी धीमी। कुछ स्टेशन पर हमें रुकना होता है, कुछ पर उतरना। लेकिन अंत में हमें चलना ही होता है।

तो अगली बार जब आप थके हों, उलझे हों, और आपको समझने वाला कोई ना हो... तो एक बार रेलवे स्टेशन जाकर देखिए।
शायद वहाँ भीड़ में आपको खुद से मिलने का मौका मिल जाए।


- शिवम शर्मा

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