चाय और मैं


चीनी महंगी हो गई है।

वैसे महंगाई तो हर चीज़ में बढ़ रही है, लेकिन चाय वाली चीज़ थोड़ी personal है। क्योंकि मुझे दिन में कम से कम तीन चाय चाहिए—सुबह, दोपहर और शाम।


सुबह की चाय के बिना दिन शुरू ही नहीं होता। नींद खुल जाती है, लेकिन दिमाग शायद चाय के बाद ही ऑन होता है।


दोपहर में काम करते-करते जब मन करता है कि बस अब बहुत हो गया, तब एक चाय मिल जाए तो लगता है चलो थोड़ा और काम कर लेते हैं।


और शाम वाली चाय तो जरूरी है। दिन कैसा भी गया हो, शाम की चाय का अपना ही मजा है। कभी अकेले पी लो, कभी किसी के साथ बैठकर, कभी बस बाहर खड़े होकर।


अब दिक्कत ये है कि तीन चाय रोज़ मतलब महीने में करीब 90 चाय। ऊपर से चीनी के दाम बढ़ते जा रहे हैं। हिसाब लगाओ तो लगता है कि भाई, चाय पीना भी अब कोई छोटी-मोटी luxury नहीं रही। 


लेकिन क्या करें?


चाय पसंद है।


बहुत पसंद है।


इसलिए चीनी महंगी हो जाए, दूध महंगा हो जाए या चायपत्ती के भाव बढ़ जाएं—चाय बंद करने का सवाल ही नहीं है।


हाँ, कभी-कभी कप में चीनी डालते हुए जरूर लगता है—


“इतनी महंगी जिंदगी में कम से कम चाय तो मीठी रहने दो।” ☕(^_^)


🖋️शिवम☺️

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