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हर दिन एक जैसा नहीं होता

किसी-किसी दिन हम चीज़ों को ज़्यादा महसूस करते हैं। सुने हुए गानों का मतलब उस दिन ज़्यादा गहरा लगने लगता है। खत्म हुई चीज़ें ज़्यादा दुख देती हैं। छोटी-छोटी बातें, जो बाकी दिनों में नज़रअंदाज़ कर देते हैं, उस दिन दिल को चुभ जाती हैं। पुराने ज़ख्म पर कोई ज़रा सा हाथ भी लगा दे, तो चीखने का मन करता है। ऐसे दिनों में मन भारी-भारी सा लगता है। बिस्तर पर लेटकर बस पंखे को घूरने का मन करता है, जैसे वो कुछ कह देगा। परफेक्ट से परफेक्ट चीजें भी उस दिन खोखली सी लगती हैं। दिल चाहता है कि खुलकर रो लें, सारा दर्द निकाल दें। लेकिन कमबख्त ज़िम्मेदारियाँ रोने तक का समय नहीं देतीं। जल्दी-जल्दी सब काम निपटाते हैं, यह सोचकर कि शाम को चैन से बैठकर रो लेंगे, इस दिन को जी भरकर कोसेंगे। मगर ये क्या, दिन तो खत्म हो गया। फिर अगला दिन आता है और वह दिन अपने साथ पिछले दिन की मायूसी नहीं लाता क्योंकि हर दिन एक जैसा नहीं होता।

भीड़ और लोगों के अप्रूवल्स इतने भी मायने नहीं रखते जितना हम मान बैठते हैं.

भीड़ और लोगों के अप्रूवल्स इतने भी मायने नहीं रखते जितना हम मान बैठते हैं. लोगों से उम्मीद रखना और इंतज़ार करने के मामलों में मैं एकदम ज़ीरो हूँ, और इसीलिए लोग जैसे दिखते हैं वैसे होते नहीं है तो मैं शांति से बिना बताए कनेक्शन कट कर लेता हूँ और अपनी धुन में लाइफ एन्जॉय करता हूँ. उनसे जवाब की अपेक्षा रखना, माफ़ी की चाहत या मन में टीस रखकर अपनी एनर्जी को खत्म करना मेरा तरीका नहीं है. मैं सारी दुनिया को एथिक्स नहीं सिखा सकता, लेकिन मैं खुद की मानसिक शांति ज़रूर बना कर रख सकता हूँ. और वैसे भी भीड़ चाहिए किसको? इतने से जीवन में थोड़े से लोग चाहिए बस जिनसे मन मिलना चाहिए और थोड़ा सा सुकून, बस इत्तु सा चाहिए!

समझ और परख

कल इंस्टाग्राम पर पढ़ा था, ज़िन्दगी में जब तक जिंदा हैं परेशानियां रहेंगी, बस शक्ल और उसके मायने बदल जाएंगे। मैं इस बात से सहमत भी हूँ, पर इन परेशानियों को समझ लेने या स्वीकार लेने की हिम्मत भी होनी चाहिए। हम किसी के चले जाने से इसलिए घबरा जाते हैं क्योंकि इसके बाद कि तैयारी हमने कहीं सीखी ही नहीं। हमें बस इतना पता है कि साथ रहने के लिए हम क्या क्या कर सकते हैं। मेरे साथ भी ऐसा ही है, मेरे पास समय का बस एक पक्ष ही है, जिसमे मुझे लगता है मैं सब ठीक कर लूंगा, पर इससे कम ही रहा। मैं कई बार अपने फैसलों पर गौर करता हूँ तो तब सही लग रहे सारे पॉसिबल फैक्ट्स अब बेकार लगते हैं। मेरा मन अजीब सा हो गया है। मुझे मालूम है कि मेरा मन शांत नहीं है लेकिन वो एक टक किसी चीज़ को देखकर सम्भल रहा है, किसी निश्चित दूरी को अंत तक समझ कर समय काट रहा है, सोच रहा है

आज मैं अपने बारे में बताता हूँ

कितने लोग कहते होंगे ना कि मैं सब समझता हूँ, कितने लोग कहते होंगे ना कि सब जानता हूँ मैं, कितने लोग कहते होंगे ना कि मैं सब जैसा नहीं हूँ, आज मैं तुम्हें अपने बारे में बताता हूँ मैं सब कुछ नहीं समझता हाँ, पर समझने का प्रयास करता हूँ कि वो सब समझ सकूँ जो समझने जैसा है।। मैं सब कुछ नहीं जानता मैं नहीं जानता किसी को रोकना मैं नहीं जानता रूठे हुए को मनाना मैं नहीं जानता मन के भाव व्यक्त करना मैं नहीं जानता दुःखी को उसके दुःखों से निकलना।। मैं सब जैसा ही हूँ मैं रोज़ गलतियाँ करता हूँ और करता हूँ उन्हें ना दोहराने का भरसक प्रयास क्योंकि ये ही सिखाती हैं कि फिर से क्या नहीं करना है तो कैसे प्रयास करना छोड़ दूँ मैं...!!

रात

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रात के 2 बजने को हैं और मैं सोने की बजाय छत पर मुंडेर पर पैर लटका कर बैठा हूँ। रेलवे स्टेशन भी घर के काफ़ी पास में है तो ट्रैन की आवाज़ें आ रही हैं। कहीं दूर किसी गली में कुत्ते के भौकने की आवाज़ आ रही हैं। शायद पास में ही किसी के यहां अखण्ड रामायण पाठ हो रहा है मगर इन सबसे अलग और सुकून देने वाली ठंडी और शांत हवा भी चल रही है जो शरीर को उसके ठंडे होने का एहसास करा रही है, और मैं भी महसूस कर रहा हूँ। मेरे चारों तरफ बस हल्की सी रोशनी है मैं अक्सर आधी रात को अपनी छत पर आकर बैठ जाता हूँ और खाली मन के साथ बैठा रहता हूँ। ना कुछ सोचता हूँ ऐसा जो मुझे परेशान करे बस ठंडी हवा को अपने अंदर निकलता रहता हूँ और ऐसा करने से कुछ टाइम के लिए ही सही पर हाँ इससे मुझे सुकून मिलता है। चलिए अब में छत से नीचे जा रहा हूँ। नींद तो अभी आएगी नहीं पर फ़िर भी सोने का प्रयास करूँगा और आखिर में सो जाऊंगा। © - शिवम

बहुत मन है छोटा हो जाऊँ

माँ के आंचल में छुप जाऊँ, कोई न ले गोदी तो मचल जाऊँ, गली में आये कुल्फ़ी वाला, कुल्फ़ी लेने को उसे रुकने को कह आऊँ, माँ का दूध पीऊं और माँ की गोद में ही सो जाऊँ, बहुत मन है छोटा हो जाऊँ ।। माँ नहाने को बुलाये और मैं पूरे घर में दौड़ लगाऊँ, नींद से जगने पर माँ को न  पाकर खूब ज़ोर से रोऊँ, न मिलने पर मनपसंद चीज़ ज़मीन पर लोटक-पीटा खाऊँ, बहुत मन है छोटा हो जाऊँ।। पापा के साथ दुकान पर ये चाहिए हाथ रखकर बताऊँ, सीटी वाली चप्पल पहन खूब इठलाऊँ, महमान आने पर घर में छुप जाऊँ, बहुत मन है छोटा हो जाऊँ।।                ©-शिvam

श्रीकृष्ण तो श्रीकृष्ण हैं

श्रीकृष्ण तो श्रीकृष्ण हैं  श्रीकृष्ण नटखट है, श्रीकृष्ण चोर भी हैं, श्रीकृष्ण प्रेम हैं, श्रीकृष्ण मित्र हैं, श्रीकृष्ण सारथी है तो, श्रीकृष्ण भाई भी हैं, श्रीकृष्ण गुरु है, कृष्णा तारक है, कृष्णा राधा के हैं सश्रीकृष्ण मीरा के भी हैं श्रीकृष्ण आपके भी हैं श्रीकृष्ण मेरे भी हैं श्रीकृष्ण हम सबके हैं कृष्ण तो कृष्ण है -Shivam