रात


रात के 2 बजने को हैं और मैं सोने की बजाय छत पर मुंडेर पर पैर लटका कर बैठा हूँ।
रेलवे स्टेशन भी घर के काफ़ी पास में है तो ट्रैन की आवाज़ें आ रही हैं। कहीं दूर किसी गली में कुत्ते के भौकने की आवाज़ आ रही हैं। शायद पास में ही किसी के यहां अखण्ड रामायण पाठ हो रहा है मगर इन सबसे अलग और सुकून देने वाली ठंडी और शांत हवा भी चल रही है जो शरीर को उसके ठंडे होने का एहसास करा रही है, और मैं भी महसूस कर रहा हूँ। मेरे चारों तरफ बस हल्की सी रोशनी है

मैं अक्सर आधी रात को अपनी छत पर आकर बैठ जाता हूँ और खाली मन के साथ बैठा रहता हूँ। ना कुछ सोचता हूँ ऐसा जो मुझे परेशान करे बस ठंडी हवा को अपने अंदर निकलता रहता हूँ और ऐसा करने से कुछ टाइम के लिए ही सही पर हाँ इससे मुझे सुकून मिलता है।

चलिए अब में छत से नीचे जा रहा हूँ। नींद तो अभी आएगी नहीं पर फ़िर भी सोने का प्रयास करूँगा और आखिर में सो जाऊंगा।

© - शिवम

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